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आखिर मोदी सरकार कहां से लेती है उधार ? इस साल 12 लाख करोड़ का लेने वाली है कर्ज

AdityaTripathi @ हम सभी जानते है कोरोना आपदा की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्थ (Indian Economy) की हालत पतली है। हमारे देश का खजाना भी दयनीय स्थिति तक पहुंच गया है। ये सब हमें तब पता जब देश की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद के पटल पर इस सत्र का बजट पेश किया। सरकार ने बजट में यह साफ़ किया है कि वित्त वर्ष 2021-22 में करीब 12 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लिया जाएगा. मौजूदा साल यानी 2020-21 में भी सरकार को करीब इतना ही कर्ज लेना पड़ा है.
आइए जानते हैं कि सरकार कर्ज किस तरह से लेती है? कर्ज की वजह से ही मौजूदा वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा रिकॉर्ड 9.5 फीसदी होगा और यह अगले साल 6.8 फीसदी होगा. सितंबर 2020 तक भारत का कुल पब्लिक डेट यानी सार्वजनिक कर्ज 1,07,04,293.66 करोड़ (107.04 लाख करोड़) रुपये तक पहुंच गया. जो कि जीडीपी के करीब 68 फीसदी के बराबर है.
मोदी सरकार को कैसे मिलता है कर्ज
सरकार दो तरह से लोन लेती है इंटर्नल या एक्सटर्नल. यानी भीतरी कर्ज जो देश के भीतर से होता है और बाहरी कर्ज जो देश के बाहर से लिया जाता है. आंतरिक कर्ज बैंकों, बीमा कंपनियों, RBI, कॉरपोरेट कंपनियों, म्यूचुअल फंडों आदि से लिया जाता है. बाह्य या बाहरी कर्ज मित्र देशों, IFM विश्व बैंक जैसी संस्थाओं,NRI आदि से लिया जाता है.
विदेशी कर्ज का बढ़ना इसलिए अच्छा नहीं माना जाता, क्योंकि इसके लिए सरकार को अमेरिकी डॉलर या अन्य विदेशी मुद्रा में चुकाना पड़ता है. विश्व बैंक के अनुसार अगर किसी देश में बाहरी कर्ज यानी विदेशी कर्ज उसके जीडीपी के 77 फीसदी से ज्यादा हो जाए तो उस देश को आगे चलकर बहुत मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है. ऐसा होने पर किसी देश की जीडीपी 1.7 फीसदी तक गिर जाती है.
देश की बात करें तो सरकार आमतौर पर सरकारी प्रतिभूतियों यानी सिक्यूरिटीज (G-Secs) के द्वारा कर्ज लेती है. मार्केट स्टेबिलाइजेशन बॉन्ड, ट्रेजरी बिल, स्पेशल सिक्योरिटीज, गोल्ड बॉन्ड, स्माल सेविंग स्कीम, कैश मैनेजमेंट बिल आदि के द्वारा जो भी पैसा आता है, वह सरकार के लिए एक कर्ज ही होता है.
जब कोई किसी जी-सेक या सरकारी बॉन्ड में निवेश करता है तो वह एक तरह से सरकार को कर्ज दे रहा होता है. सरकार एक निश्चित समय के बाद यह कर्ज लौटाती है और एक निश्चित ब्याज देती है. सरकार सड़कें, स्कूल आदि बनाने के लिए अक्सर ऐसे G-Secs जारी करती है. जो G-Secs एक साल से कम परिपक्वता अवध‍ि वाले होते हैं उन्हें ट्रेजरी बिल (T-bills) कहते हैं. एक साल से ज्यादा के G-Secs को सरकारी बॉन्ड कहा जाता है. इसके अलावा राज्य सरकारें केवल बॉन्ड जारी कर सकती हैं जिन्हें स्टेट डेवलपमेंट लोन्स (SDLs) कहा जाता है.
सरकार काफी पहले से ऐसे ट्रेजरी बिल या बॉन्ड जारी करने की डेट बता देती है. आमतौर ऐसी सरकारी प्रतिभूतियों में बैंक, बीमा कंपनियां, वित्तीय संस्थान, म्यूचुअल फंड, पेंशन फंड आदि संस्थागत निवेशक निवेश करते हैं. साल 2001 से इसमें आम निवेशकों यानी सभी लोगों को निवेश करने का अध‍िकार दिया गया, लेकिन आम निवेशकों के लिए सिर्फ 5 फीसदी हिस्सा मिलता है. यानी यदि कोई जी-सेक 100 करोड़ रुपये का है तो सिर्फ 5 करोड़ रुपये आम जनता से लिए जाएंगे.
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