छत्तीसगढ़

दिल्ली में भी गोधन न्याय योजना की चर्चा, गणतन्त्र दिवस पर निकलने वाली झांकियों में छत्तीसगढ़ का भी चयन

छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही गोबर पर आधारित गोधन न्याय योजना की पूरे देश में काफी तारीफें हो रही है। यहां तक कि दिल्ली में भी गोबर पर आधारित योजना की तारीफ की जा रहीं हैं।
असल में, आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर इंडिया-75 न्यू आईडिया की थीम घोषित की गई है। दिल्ली में गणतन्त्र दिवस पर राजपथ पर 12 राज्यों की झांकियां निकलने वाली हैं। इनमें छत्तीसगढ़ का भी चयन हुआ है। 22 जनवरी को नई दिल्ली की राष्ट्रीय रंगशाला में प्रेस प्रीव्यू का आयोजन किया गया।
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प्रेस प्रीव्यू के दौरान छत्तीसगढ़ की गांव और गौठान पर आधारित झांकी को राष्ट्रीय मीडिया की काफी सराहना मिली। इसमें झांकी के समक्ष छत्तीसगढ़ के READ कलाकारों ने ककसाड़ नृत्य का प्रदर्शन किया।
बता दें कि राजपथ पर निकलने वाली छत्तीसगढ़ की झांकी गोधन योजना पर केंद्रित है। ग्रामीण संसाधनों के उपयोग के पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समन्वय से एक साथ बहुत सी वैश्विक चिंताओं के समाधानों के लिए यह झांकी विकल्प पेश करती है। इसके बाद झांकी के अगले भाग में गाय के गोबर को एकत्रित करके उन्हें विक्रय के लिए गौठानों के संग्रहण केंद्रों की ओर ले जाती ग्रामीण महिलाओं को दिखाया गया है।
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इस झांकी में जो महिलाएं दिखाई दे रही हैं वे सभी पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में हैं। उन्होंने हाथों से बने कपड़े और गहने पहने हुए हैं। इसके बाद दिखाया गया है कि इन्हीं में से एक महिला गोबर से उत्पाद तैयार कर विक्रय के लिए बाजार ले जा रही है। उनके चारों ओर सजे फूलों के गमले गोठानों में साग-सब्जियों और फूलों की खेती के प्रतीक हैं। इसके बाद नीचे की ओर गोबर से बने दीयों की सजावट की गई है। ये दीपक ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आए स्वावलंबन और आत्मविश्वास के प्रतीक हैं।
झांकी के पिछले भाग में गौठानों को रूरल इंडस्ट्रीयल पार्क के रूप में विकसित होते हुए दर्शाया गया है। नई तकनीकों और मशीनों का प्रयोग करके महिलाएं स्वयं की उद्यमिता का विकास कर रही हैं। वे गांवों में छोटे-छोटे उद्योगों का संचालन कर रही हैं। इसके बाद मध्य भाग में यह दिखाया गया है कि गाय को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के केंद्र में रखकर किस तरह पर्यावरण संरक्षण, जैविक खेती, पोषण, रोजगार और आय में बढ़ोतरी के लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।
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इसके बाद अंत में चित्रकारी करती हुई ग्रामीण महिला पारंपरिक शिल्प और कलाओं के विकास की प्रतीक है। झांकी में भित्ती-चित्र शैली में विकसित हो रही जल प्रबंधन प्रणालियों, बढ़ती उत्पादकता और खुशहाल किसान को दर्शाया गया है। इसी कड़ी में गोबर से बनी वस्तुएं और गोबर से वर्मी कंपोस्ट तैयार करती स्व सहायता समूहों की महिलाओं को भी दर्शाया गया है।

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