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गगनयान मिशन को लेकर डीआरडीओ ने लगाई बड़ी छलांग, अंतरिक्ष से लौटते वक्त खास पैराशूट बचाएगा जान!

नई दिल्ली: भारत के महत्वाकांक्षी मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान को एक अहम तकनीकी सफलता मिली है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने मिशन के लिए विकसित किए गए ड्रोग पैराशूट का सफल परीक्षण कर लिया है। यह उपलब्धि अंतरिक्ष से लौटते समय अंतरिक्ष यान की सुरक्षित लैंडिंग सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह परीक्षण 18 फरवरी को चंडीगढ़ स्थित टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी में डीआरडीओ की अत्याधुनिक रेल ट्रैक रॉकेट स्लेज सुविधा पर किया गया। यह विशेष परीक्षण केंद्र उच्च गति एयरोडायनामिक और बैलिस्टिक मूल्यांकन के लिए जाना जाता है। परीक्षण के दौरान पैराशूट पर वास्तविक उड़ान के दौरान पड़ने वाले अधिकतम दबाव से भी अधिक भार डाला गया, ताकि उसकी मजबूती और विश्वसनीयता को परखा जा सके।

मानकों से अधिक दबाव में भी सफल
मंत्रालय ने बताया कि ड्रोग पैराशूट ने तय मानकों से ज्यादा भार सहन करते हुए उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। इससे यह प्रमाणित हुआ कि इसका डिजाइन सुरक्षित, मजबूत और मिशन की जरूरतों के अनुरूप है। यह सफलता इस बात का भी संकेत है कि भारत अब उच्च क्षमता वाले रिबन पैराशूट स्वदेशी तकनीक से विकसित करने में सक्षम हो चुका है।

ड्रोग पैराशूट की खास भूमिका
ड्रोग पैराशूट अंतरिक्ष यान की वापसी के दौरान बेहद अहम भूमिका निभाता है। तेज रफ्तार कम करता है: यह यान की अत्यधिक गति को तेजी से घटाता है, जिससे आगे की लैंडिंग प्रक्रिया सुरक्षित बनती है।
संतुलन बनाए रखता है: यान को स्थिर और सही दिशा में रखता है, ताकि मुख्य पैराशूट सही ढंग से खुल सकें।
मुख्य पैराशूट की तैयारी: ड्रोग पैराशूट के बाद बड़े पैराशूट खुलते हैं, जो यान को नियंत्रित गति से सुरक्षित लैंडिंग तक पहुंचाते हैं।

रक्षा मंत्री ने दी बधाई
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि पर डीआरडीओ, इसरो और उद्योग जगत से जुड़े सभी पक्षों को बधाई देते हुए इसे ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक बड़ा कदम बताया। वहीं, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव एवं डीआरडीओ अध्यक्ष समीर वी के कामत ने भी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की टीम को शुभकामनाएं दीं।

ड्रोग पैराशूट के इस सफल परीक्षण से गगनयान मिशन की तैयारियों को नई गति मिली है। यह उपलब्धि न केवल भारत की तकनीकी क्षमता को दर्शाती है, बल्कि मानव अंतरिक्ष उड़ान के क्षेत्र में देश की बढ़ती आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिष्ठा को भी मजबूत करती है।

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