गुप्तचर विशेष

जानिए कौन हैं बस्तर के ‘गांधी’, जिनके अथक प्रयासों से नक्सलियों के कब्जे से रिहा हुए जवान ‘राकेश्वर सिंह’

रायपुर| बस्तर इलाके के जिन जंगलों में सरकारी लोग जाने से कतराते हैं और आए दिन सुरक्षाबलों और नक्सलियों की मुठभेड़ होती रहती है, वहां धर्मपाल सैनी एक सेतु की तरह हैं।

आपको बता दें, वह अकसर सरकार और नक्सलियों के बीच संवाद की राह बनाते हैं। उनके ही प्रयासों से बीजापुर में नक्सलियों से मुठभेड़ के दौरान अगवा किए गए सीआरपीएफ कमांडो राकेश्वर सिंह मन्हास की रिहाई हो सकी है। राकेश्वर सिंह की रिहाई के बाद से ही 91 साल के धर्मपाल सैनी की चर्चा जोरों पर है।

बस्तर को लेकर धर्मपाल सैनी ने लिया महत्वपूर्ण फैसला

विनोबा भावे के शिष्य रहे धर्मपाल सैनी का बस्तर से नाता 1960 के दशक में जुड़ा था। उन्होंने यहां कि बेटियों की जिंदगी को बदलने का बीड़ा उठाया और आज भी अनवरत चल रहे हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के धार जिले के रहने वाले धरमपाल सैनी विनोबा भावे के शिष्य रहे हैं।

कहा जाता है कि 60 के दशक में सैनी ने एक अखबार में बस्तर की लड़कियों से जुड़ी एक खबर पढ़ी थी। खबर के अनुसार दशहरा के आयोजन से लौटते वक्त कुछ लड़कियों के साथ कुछ लड़के छेड़छाड़ कर रहे थे। लड़कियों ने उन लड़कों के हाथ-पैर काट कर उनकी हत्या कर दी थी। यह खबर उनके मन में घर कर गई। उन्होंने फैसला लिया कि वे बच्चियों की ऊर्जा को सही स्थान पर लगाएंगे और उन्हें प्रेरित करेंगे।

कहा जाता है कि धर्मपाल सैनी ने बस्तर जाने के लिए जब विनोबा भावे से परमिशन मांगी तो वे नहीं माने। हालांकि धर्मपाल सैनी की जिद के बाद उन्होंने अनुमति दी, लेकिन यह शर्त भी रखी कि वह कम से कम 10 बरस तक बस्तर में ही रहेंगे। 1976 में सैनी बस्तर आए और यहीं के होकर रह गए, उनके स्टूडेंट्स और स्थानीय लोग उन्हें ताऊजी कहकर बुलाते हैं।

एथलीट रहे धर्मपाल सैनी ने अब तक बस्तर में 2 हजार से ज्यादा खिलाड़ी तैयार किए हैं। वे बताते हैं कि जब वे बस्तर आए तो देखा कि छोटे-छोटे बच्चे भी 15 से 20 किलोमीटर आसानी से चल लेते हैं। बच्चों के इस स्टैमिना को स्पोर्ट्स और एजुकेशन में यूज करने का प्लान उन्होंने तैयार किया। 1985 में पहली बार आश्रम की छात्राओं को उन्होंने स्पोर्ट्स कॉम्पिटीशन में उतारा।

शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान

आदिवासी इलाकों में साक्षरता को बढ़ाने में धर्मपाल सैनी का अहम योगदान माना जाता है। इसी के चलते उन्हें सरकार ने पद्मश्री से नवाजा था। सैनी के आने से पहले तक बस्तर में साक्षरता का ग्राफ 10 प्रतिशत भी नहीं था। जनवरी 2018 में ये बढ़कर 53 प्रतिशत हो गया, जबकि आसपास के आदिवासी इलाकों का साक्षरता ग्राफ अब भी काफी पीछे है।

बस्तर में शिक्षा की अलख जगाने के पीछे भी धर्मपाल सैनी की प्रेरणा काम करती है। उन के बस्तर आने से पहले तक आदिवासी लड़कियां स्कूल नहीं जाती थीं, वहीं आज बहुत सी पूर्व छात्राएं अहम प्रशासनिक पदों पर काम कर रही हैं। बालिका शिक्षा में इसी योगदान के लिए धर्मपाल सैनी को साल 1992 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया था।

 

जानिए जवान राकेश्वर सिंह मनहास की जीवन से जुडी कुछ ख़ास बातें:

2011 में सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे राकेश्वर सिंह

राकेश्वर सिंह मनहास साल 2011 में सीआरपीएफ (CRPF) में भर्ती हुए थे. तीन महीने पहले ही छत्तीसगढ़ में उनकी पोस्टिंग हुई थी. 7 साल पहले राकेश्वर सिंह की शादी हुई थी और एक 5 साल की बेटी है.

मां कुंती देवी और पत्नी मीनू ने केंद्र और राज्य सरकार से राकेश्वर को नक्सलियों के कब्जे से छुड़ाने की मांग की है. उनके पिता जगतार सिंह भी सीआरपीएफ में थे. उनका निधन हो चुका है. छोटा भाई सुमित कुमार प्राइवेट सेक्टर में काम करता है. बहन सरिता की शादी हो चुकी है.

नक्सलियों के हमले में शहीद हुए 22 जवानों की कहानी 

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में तीन अप्रैल की सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक नक्सलियों और सुरक्षा बल के बीच मुठभेड़ हुई और इस मुठभेड़ में हमारे 22 जवान शहीद हो गए. इनमें कांकेर के शहीद जवान रमेश जुर्री भी हैं. उनकी चार साल पहले ही शादी हुई थी और उनकी तीन साल की एक बेटी है, जिसने आज उन्हें श्रद्धांजलि अपर्ति की.

परिवार के लोग जब उसे शहीद पिता के पार्थिव शरीर के पास लेकर गए तो इस बच्ची को शायद पता भी नहीं था कि वो अपने पिता को आखिरी बार देख रही है. सोचिए एक जवान अपने देश की रक्षा के लिए अपने पीछे अपने परिवार को किस तरह अकेला छोड़ कर चला जाता है.

परिवार की हिम्मत और उम्मीदें टूट गईं

इस दर्द को आप अयोध्या से आई तस्वीरों से भी समझ सकते हैं, जहां शहीद राज कुमार यादव के परिवार को जब उनकी शहादत की खबर मिली तो पूरे परिवार की हिम्मत और उम्मीदें टूट गईं. गांव में शोक की लहर दौड़ गई और हर किसी की आंखें नम दिखीं. शहीद राज कुमार यादव कोबरा बटालियन के कमांडो थे और तीन भाईयों में सबसे बड़े थे.

दो महीने पहले 10 जनवरी को ही उन्होंने अपनी मां का कैंसर का ऑपरेशन कराया था और इसके बाद वो ड्यूटी पर छत्तीसगढ़ आ गए थे. उन्होंने अपनी मां से वादा किया था कि वो जल्द ही घर आकर उनसे मिलेंगे, लेकिन एक वादा उन्होंने भारत मां से भी किया था और उसे निभाने के लिए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दे दिया.

छत्तीसगढ़ के गरियाबन्द में जब शहीद सुख सिंह की पत्नी को उनकी शहादत की खबर मिली तो उन्हें बड़ा धक्का लगा. शहीद सुख सिंह ने अपनी पत्नी को वादा किया था कि वो 3 अप्रैल को घर जरूर लौटेंगे,  लेकिन वो अपना ये वादा पूरा नहीं कर पाए और इससे इनकी पत्नी को गहरा सदमा लगा है.

आज हम उन्हें भी सलाम करते हैं. सोचिए शहीद जवानों का भी तो परिवार होता है, उनके भी बच्चे होते हैं, माता पिता होते हैं, जीवनसाथी होता है, लेकिन वो ये सब भूल कर देश की रक्षा के लिए अपनी शहादत दे देते हैं और इसलिए आज हम उन्हें नमन करना चाहते हैं. शहीद सुख सिंह की तरह और भी जवान हैं, जिनके घरों में आज मातम पसरा हुआ है क्योंकि, ये शहीद देश की रक्षा के लिए अपने पीछे एक हंसता खेलता परिवार छोड़ गए हैं.

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सली हमले में 22 जवान शहीद हो गए. पूरा देश और इनके परिवार गौरवान्वित है, लेकिन इनकी कमी आंसुओं के साथ बह रही है.

 

 

Related Articles

Leave a Reply

Back to top button