
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के 72वें संस्करण में ‘राम-नामी’ को जूरी द्वारा सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र चुना जाना छत्तीसगढ़ के लिए सामान्य सांस्कृतिक उपलब्धि नहीं है। यह उस लोक परंपरा के राष्ट्रीय मंच पर पहुंचने का क्षण है, जिसने सदियों से नहीं तो कम-से-कम एक सदी से अधिक समय से ‘राम’ को केवल आराधना का विषय नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाया है। जब 22 सितंबर 2026 को गुजरात के एकता नगर में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान करेंगी, तब ‘राम-नामी’ के सम्मान के साथ छत्तीसगढ़ की एक ऐसी सांस्कृतिक कथा भी देश के सामने होगी, जिसमें भक्ति, सामाजिक चेतना, आत्मसम्मान, लोक-स्मृति और दृश्य अभिव्यक्ति एक साथ दिखाई देती है।
छत्तीसगढ़ के रामनामी समाज की विशेषता यह है कि उसके लिए राम केवल मंदिर में विराजमान आराध्य नहीं हैं। राम नाम शरीर पर है, वस्त्रों पर है, लोकगीतों में है, भजनों में है, अभिवादन में है और जीवन-दर्शन में है। छत्तीसगढ़ की इस परंपरा में शरीर को ही मंदिर मानने की अवधारणा मिलती है। समाज के अनेक अनुयायी अपने शरीर पर ‘राम-राम’ का गोदना धारण करते हैं। सफेद वस्त्रों पर राम नाम, मोरपंख से बने मुकुट, घुंघरुओं की ध्वनि और सामूहिक भजन इसकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बनाते हैं।
‘राम-नामी’ वृत्तचित्र को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलना इस दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं; वह समाज की स्मृतियों, संघर्षों और सांस्कृतिक विरासत को दर्ज करने का शक्तिशाली माध्यम भी है। किसी लोक समुदाय की मौखिक परंपरा जब कैमरे के माध्यम से दस्तावेज में बदलती है, तो वह स्थानीय अनुभव से निकलकर राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा बन जाती है। यही इस पुरस्कार की सबसे बड़ी सार्थकता है।
रामनामी समाज के संदर्भ में यह बात विशेष रूप से लागू होती है। छत्तीसगढ़ की मौखिक परंपराओं में रामकथा के अनेक रूप मिलते हैं – रामायण गायन, भजन, लोकगीत, कथावाचन, नृत्य और सामुदायिक अनुष्ठान। यहां राम केवल अयोध्या के राजा या धार्मिक आख्यान के पात्र नहीं, बल्कि लोकजीवन के नैतिक आदर्श हैं। मर्यादा, सत्य, त्याग, करुणा और सामाजिक समरसता जैसे मूल्यों के साथ राम का संबंध लोकमानस में लगातार पुनर्निर्मित होता रहा है।
रामनामी परंपरा इस व्यापक रामकथा को एक अलग दृश्य रूप देती है। शरीर पर अंकित ‘राम’, राम नाम वाली चादर, मोरपंखी मुकुट और भजन के साथ बजते घुंघरू – ये सभी मिलकर एक ऐसी जीवंत दृश्य भाषा बनाते हैं जिसे किसी पुस्तक के पन्नों में पूरी तरह समेटना कठिन है। शायद इसी कारण कैमरा इस परंपरा के लिए महज रिकॉर्डिंग का उपकरण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति को सुरक्षित रखने का माध्यम बन जाता है।
आज जब नई पीढ़ी डिजिटल संस्कृति, सोशल मीडिया और तेज बदलते जीवन के बीच आगे बढ़ रही है, तब यह प्रश्न भी जरूरी है कि हमारी लोक परंपराएं किस रूप में आगे जाएंगी। क्या राम नाम का गोदना केवल संग्रहालयों की तस्वीर बनकर रह जाएगा? क्या आने वाली पीढ़ियां रामनामी भजनों, घुंघरुओं, मोरपंखी मुकुट और सामूहिक लोक-अनुष्ठानों को उसी जीवंतता से आगे ले जाएंगी? इन प्रश्नों का उत्तर केवल रामनामी समाज से नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ से जुड़ा है।
इसलिए ‘राम-नामी’ का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार केवल सम्मान पाने का अवसर नहीं, संरक्षण का भी आह्वान है। जरूरत इस बात की है कि रामनामी समाज की मौखिक परंपराओं, लोकगीतों, भजनों, कथाओं, गोदना कला, पारंपरिक प्रतीकों और सामाजिक इतिहास का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण हो। विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थानों, फिल्मकारों और शोधकर्ताओं को मिलकर इस विरासत पर काम करना चाहिए।
छत्तीसगढ़ ने देश को यह दिखाया है कि राम की भक्ति केवल मंदिर की घंटियों में नहीं, लोकजीवन की सांसों में भी हो सकती है। कहीं रामायण की चौपाइयों में राम हैं, कहीं लोकगीतों में, कहीं भित्तिचित्रों में, कहीं गांवों की कथाओं में और रामनामी समाज में तो राम नाम शरीर पर ही अंकित है।
एक तरफ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के मंच पर ‘राम-नामी’ का सम्मान है और दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के रजत महोत्सव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने रामनामी समाज की आत्मीय उपस्थिति। इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखें तो संदेश स्पष्ट है – छत्तीसगढ़ की संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता और उसकी लोक जड़ों में है।
इस परंपरा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसका सामाजिक संदर्भ भी है। सांस्कृतिक अध्ययनों के अनुसार छत्तीसगढ़ के रामनामी समुदाय में राम नाम का गोदना सामाजिक प्रतिकार और आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति के रूप में विकसित हुआ। मंदिर प्रवेश और धार्मिक ज्ञान से वंचित किए जाने की परिस्थितियों में राम नाम को शरीर पर अंकित कर देना अपने भीतर ईश्वर की उपस्थिति और समान आध्यात्मिक अधिकार की घोषणा भी था। यानी ‘राम’ यहां केवल आस्था नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की भाषा भी बने।
यही कारण है कि रामनामी परंपरा को केवल धार्मिक अनुष्ठान या लोक-वेशभूषा के रूप में देखना इसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देना होगा। यह छत्तीसगढ़ के सामाजिक इतिहास, लोक-संस्कृति और भक्ति परंपरा का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। रामनामी समाज की अपनी भजन परंपरा, सामुदायिक आयोजन और सांस्कृतिक प्रतीक इस बात के प्रमाण हैं कि लोक समाज अपने अनुभवों को किस प्रकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित करता है।
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक चेतना में राम का स्थान वैसे भी अत्यंत व्यापक है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी राज्य की रामभक्ति और रामायण परंपरा का उल्लेख सामने आता रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2025 में बिलासपुर के एक कार्यक्रम में भी छत्तीसगढ़ की ‘राम भक्ति’ को विशेष रूप से रेखांकित करते हुए कहा था कि रामनवमी का पर्व राज्य की सांस्कृतिक चेतना से विशेष रूप से जुड़ा है।
लेकिन 1 नवंबर 2025 का छत्तीसगढ़ राज्योत्सव (रजत महोत्सव) इस सांस्कृतिक संबंध का एक अलग ही दृश्य प्रस्तुत करता है। नवा रायपुर में राज्य की 25 वर्ष की यात्रा के अवसर पर आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रामनामी समाज के प्रतिनिधियों से आत्मीय मुलाकात हुई। रामनामी प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री का पारंपरिक ढंग से स्वागत किया और उन्हें राम नाम अंकित शॉल तथा मोरपंख से बनी पारंपरिक खुमरी भेंट की। यह दृश्य इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि राज्य के सबसे बड़े राष्ट्रीय समारोह के मंच पर छत्तीसगढ़ की एक विशिष्ट लोक-परंपरा सीधे देश के प्रधानमंत्री के सामने अपनी पहचान के साथ उपस्थित थी।
यह मुलाकात प्रतीकात्मक अर्थों में भी महत्वपूर्ण है। एक ओर आधुनिक भारत की विकास यात्रा का प्रतिनिधित्व करता राष्ट्रीय नेतृत्व और दूसरी ओर गांवों की मिट्टी से निकली वह परंपरा, जिसने अपने तन पर राम नाम लिखकर अपनी पहचान बनाई – दोनों का यह संवाद बताता है कि विकास और विरासत को एक-दूसरे के विरोध में देखने की आवश्यकता नहीं है। छत्तीसगढ़ की शक्ति इसी मेल में है।
‘राम-नामी’ का राष्ट्रीय सम्मान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे छत्तीसगढ़ की वह आवाज देश तक पहुंच रही है, जो कहती है – राम केवल नाम नहीं, स्मृति हैं; राम केवल आस्था नहीं, जीवन-मूल्य हैं; और राम केवल कथा नहीं, लोक की जीवित संस्कृति हैं।
अब चुनौती यह है कि इस सम्मान को केवल एक पुरस्कार की खबर बनाकर न छोड़ा जाए। इसे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, अध्ययन और नई पीढ़ी तक हस्तांतरण के अवसर में बदला जाए। क्योंकि जिस समाज ने अपने शरीर को राम का मंदिर बना दिया, उसकी संस्कृति को संरक्षित करना केवल एक समुदाय का नहीं, पूरे समाज का दायित्व है।
लेखक : भूपेश कुमार त्रिपाठी
