विवाह पूर्व सहमति से संबंध सामान्य, चरित्र से नहीं जोड़ सकते : सुप्रीम कोर्ट
समझौता दोष स्वीकार करने के बराबर नहीं, भर्ती समिति का निर्णय तर्कहीन

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आज के बदलते दौर में विवाह से पहले सहमति से बने संबंध सामान्य हैं और इन्हें किसी व्यक्ति के चरित्र से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में समझौता कर लेना आरोपी द्वारा दोष स्वीकार करने के समान नहीं माना जा सकता।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एक महिला अभ्यर्थी की नियुक्ति रोक दी गई थी। भर्ती बोर्ड ने लोक अदालत में हुए समझौते को अभ्यर्थी की नैतिक अयोग्यता से जोड़ते हुए उसे पुलिस कांस्टेबल पद के लिए अनुपयुक्त माना था।
अदालत ने भर्ती समिति के फैसले को मनमाना और तर्कहीन बताते हुए कहा कि धोखाधड़ी के आरोप से जुड़े मामले में शिकायतकर्ता स्वयं समझौते के लिए तैयार हो गया था। ऐसे में केवल समझौते के आधार पर अभ्यर्थी के चरित्र पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
दरअसल, अभ्यर्थी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 417, 420 और 506 के तहत मामला दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर संबंध बनाए। दोनों के बीच करीब चार वर्षों तक संबंध रहे, लेकिन बाद में आरोपी ने किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया। इसके बाद मामला दर्ज कराया गया था।
बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया और मामला लोक अदालत में समाप्त कर दिया गया। हालांकि, भर्ती बोर्ड ने इस समझौते को अपराध स्वीकार करने के रूप में देखा और नियुक्ति रद्द कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दो बालिग व्यक्तियों के बीच सहमति से बने संबंधों को नैतिकता के आधार पर गलत नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है, जो अविवाहित बालिगों को अपनी पसंद के संबंध बनाने से रोकता हो।
