रायपुर में ग्रीन कॉरिडोर बनाकर बचाई गईं दो जिंदगियां, सुनील कुमार का अंगदान बना मिसाल
* 39 वर्षीय युवक के ब्रेन डेथ के बाद परिवार के फैसले ने दो लोगों को दी नई जिंदगी, छत्तीसगढ़ में अंगदान के बढ़ते आंकड़े

रायपुर: कभी-कभी एक फैसला केवल एक परिवार का नहीं होता, बल्कि कई जिंदगियों की दिशा बदल देता है। रायपुर में ऐसा ही एक भावुक और प्रेरणादायक मामला सामने आया, जहां ग्रीन कॉरिडोर बनाकर दो लोगों को नई जिंदगी दी गई। इस पूरी कहानी के केंद्र में हैं 39 वर्षीय सुनील कुमार, जिनका अंगदान आज मानवता की मिसाल बन गया है।
23 मार्च को एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने के बाद सुनील कुमार को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान रायपुर में भर्ती कराया गया था। कई दिनों तक चले इलाज और डॉक्टरों के अथक प्रयासों के बावजूद उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ और अंततः उन्हें ब्रेन डेथ घोषित किया गया।
यह क्षण परिवार के लिए बेहद कठिन था। पांच सदस्यों के परिवार की जिम्मेदारी उठाने वाले सुनील कुमार के चले जाने का दुख असहनीय था, लेकिन इसी बीच उनके परिजनों ने एक ऐसा साहसिक निर्णय लिया, जिसने इस दुख को उम्मीद में बदल दिया—अंगदान का निर्णय।
ग्रीन कॉरिडोर: जब हर सेकंड बना जिंदगी का सहारा
अंगदान के बाद सबसे बड़ी चुनौती होती है अंगों को समय पर सुरक्षित तरीके से जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचाना। 18 अप्रैल की शाम रायपुर पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए शहर में ग्रीन कॉरिडोर तैयार किया।
पुलिस आयुक्त संजीव शुक्ला के नेतृत्व में ट्रैफिक को नियंत्रित कर एक विशेष मार्ग बनाया गया, जिससे अंगों को बिना किसी रुकावट के तेजी से अस्पताल तक पहुंचाया जा सका। यह तेज़ और सटीक समन्वय ही दो मरीजों के लिए जीवनदान साबित हुआ।
दो मरीजों को मिला नया जीवन
सुनील कुमार की दोनों किडनियों का सफल प्रत्यारोपण 39 और 45 वर्षीय दो मरीजों में किया गया, जो लंबे समय से क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) से पीड़ित थे।
डॉक्टरों के अनुसार, यह ट्रांसप्लांट केवल एक सर्जरी नहीं, बल्कि दो परिवारों के लिए नई शुरुआत है। जिन मरीजों की जिंदगी डायलिसिस पर निर्भर थी, उन्हें अब सामान्य जीवन जीने की उम्मीद मिली है।
टीमवर्क से संभव हुई जटिल प्रक्रिया
इस पूरे ऑपरेशन की सफलता के पीछे कई विभागों और विशेषज्ञों की सामूहिक मेहनत रही। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान रायपुर के नेफ्रोलॉजी, यूरोलॉजी, एनेस्थीसियोलॉजी, ट्रॉमा, न्यूरोसर्जरी, सीसीयू और फॉरेंसिक विभागों ने बेहतरीन समन्वय के साथ काम किया।
ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन टीम के सदस्यों—श्री विषोक, सुश्री विनिता और सुश्री अम्बे—ने क्रॉस-मैचिंग और समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं, श्री बालाजी अस्पताल की विशेषज्ञ टीम, जिसमें डॉ. देवेंद्र नाईक, डॉ. पुष्पेंद्र नाईक, डॉ. सूरज जाजू, डॉ. विवेक वाधवा, डॉ. साईनाथ पट्टेवार और डॉ. रवि धर शामिल थे, ने भी इस प्रक्रिया को सफल बनाने में अहम योगदान दिया। ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर्स दीपक मौर्य और कृष्णकांत साहू की भूमिका भी सराहनीय रही।
प्रशासन और पुलिस का अहम सहयोग
अंगदान की प्रक्रिया में कानूनी और प्रशासनिक औपचारिकताएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती हैं। अमानाका के पूर्व थाना प्रभारी भरत बारेठ ने एनओसी और पोस्टमार्टम संबंधी प्रक्रियाओं को समय पर पूरा कराने में विशेष सहयोग दिया।
पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के बीच बेहतर तालमेल ने इस पूरी प्रक्रिया को बिना किसी बाधा के पूरा करने में मदद की।
छत्तीसगढ़ में बढ़ रही अंगदान की जागरूकता
राज्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन के अनुसार, छत्तीसगढ़ में यह 13वां अंगदान है। अब तक राज्य में 52 सफल प्रत्यारोपण किए जा चुके हैं, जिनमें 25 किडनी, 8 लीवर, 5 हार्ट वाल्व, 20 कॉर्निया और 3 स्किन ग्राफ्ट शामिल हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब तक 3000 से अधिक लोग अंगदान की शपथ ले चुके हैं, जो समाज में बढ़ती जागरूकता और सकारात्मक सोच का संकेत है।
एक कहानी जो हमेशा याद रहेगी
सुनील कुमार अपने परिवार के लिए सिर्फ एक सदस्य नहीं, बल्कि सहारा थे। लेकिन उनके अंतिम निर्णय ने उन्हें एक ऐसी पहचान दी, जो समाज के लिए प्रेरणा बन गई है। उनका यह त्याग यह सिखाता है कि जीवन का अंत भी किसी के लिए नई शुरुआत बन सकता है।
यह कहानी सिर्फ दो जिंदगियां बचाने की नहीं, बल्कि इंसानियत, साहस और उम्मीद की है—जहां एक ग्रीन कॉरिडोर ने सचमुच जिंदगी को रास्ता दिखाया।

