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होली में संतान प्राप्ति की कामना: 200 साल पुरानी परंपरा निभा रहे छत्तीसगढ़ के लोग, निसंतान महिलाएं करती हैं इलोजी की पूजा

रायपुर: राजधानी रायपुर के सदर बाजार में होलिका दहन के अवसर पर एक अनोखी और करीब 200 साल पुरानी परंपरा आज भी पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है। यहां होलिका के प्रेमी माने जाने वाले लोकदेवता इलोजी, जिन्हें सेठ नाथूराम के नाम से भी जाना जाता है, की पूजा की जाती है। विशेष रूप से निसंतान महिलाएं संतान प्राप्ति की कामना से इलोजी के चरणों में श्रद्धा अर्पित करती हैं।

सदर बाजार के व्यापारियों के अनुसार यह परंपरा दो शताब्दियों से चली आ रही है। होलिका दहन के दिन दूल्हे के स्वरूप में इलोजी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है और प्रतीकात्मक रूप से उनकी बारात निकाली जाती है। इस आयोजन की शुरुआत लगभग 200 वर्ष पूर्व सराफा व्यापारियों ने मिलकर की थी, जो आज भी निरंतर जारी है।

लोककथाओं के अनुसार, हिरण्यकश्यप की बहन होलिका का विवाह इलोजी से होना तय था और दोनों के बीच गहरा प्रेम था। लेकिन प्रह्लाद को अग्नि में जलाने की योजना के दौरान होलिका स्वयं अग्नि में भस्म हो गई। कहा जाता है कि जब इलोजी को इसकी सूचना मिली तो वे दूल्हे के वेश में बारात लेकर निकले थे। होलिका की मृत्यु का समाचार सुनकर वे शोक में डूब गए और उनकी राख अपने शरीर पर लगाकर जीवनभर अविवाहित रहने का संकल्प लिया। इसी प्रेम और विरह की कथा ने इलोजी को लोकआस्था में विशेष स्थान दिलाया।

Holi 2023 : अपने प्रेमी इलोजी को पाने के लिए अग्नि में जली थी होलिका...

इलोजी को प्रेम का देवता माना जाता है। मान्यता है कि निसंतान महिलाएं संतान सुख की प्राप्ति के लिए उनकी पूजा करती हैं। राजस्थान में भी लोकदेवता इलोजी की पूजा प्रचलित है और पाली सहित कई स्थानों पर उनके मंदिर स्थित हैं। होली से पहले कई क्षेत्रों में उनकी प्रतिमा स्थापित कर पूजा-पाठ किया जाता है।

रायपुर के सदर बाजार में यह आयोजन एकादशी से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक चलता है। होलिका दहन के दिन धूमधाम से बारात निकाली जाती है। बारात में शामिल लोगों के लिए विशेष पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। होली के दूसरे दिन धूल भरी होली के साथ यह उत्सव संपन्न होता है।

इस परंपरा की शुरुआत नाहटा परिवार और नाहटा मार्केट से मानी जाती है। यहां इलोजी की दो प्रतिमाएं स्थापित हैं—एक लगभग 200 वर्ष पुरानी और दूसरी करीब 50 वर्ष पुरानी। आयोजन की व्यवस्था शाकद्विपीय ब्राह्मण समाज, पुष्टिकर समाज और रायपुर सर्राफा एसोसिएशन के सहयोग से की जाती है।

पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही यह अनूठी परंपरा न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि रायपुर की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का भी जीवंत उदाहरण है।

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