MP में 51 IAS-IPS अफसरों का ‘लैंड गेम’! 5.5 करोड़ की जमीन बनी 65 करोड़ की

भोपाल/इंदौर: मध्य प्रदेश के धार जिले के पीथमपुर क्षेत्र स्थित गोराड़ा घाट गांव में हुई एक बड़ी जमीन खरीदी अब कथित “लैंड गेम” और अंदरूनी जानकारी के इस्तेमाल को लेकर सवालों के घेरे में आ गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वर्ष 2022 में करीब 50 आईएएस और आईपीएस अधिकारियों सहित कुछ अन्य लोगों ने एक ही दिन में लगभग 2.023 हेक्टेयर कृषि भूमि खरीदी थी। आरोप है कि जमीन खरीद के कुछ ही समय बाद उसी क्षेत्र में 3200 करोड़ रुपये की वेस्टर्न बायपास परियोजना को मंजूरी मिल गई और फिर जमीन का लैंड यूज बदल दिया गया।
एक दिन में हुई थी सामूहिक खरीद
रिपोर्ट के मुताबिक 4 अप्रैल 2022 को इस कृषि भूमि की रजिस्ट्री हुई थी। दस्तावेजों में जमीन की कीमत लगभग 5.5 करोड़ रुपये दिखाई गई, जबकि बाजार मूल्य करीब 7.78 करोड़ रुपये बताया गया। उस समय यह जमीन कृषि भूमि के रूप में दर्ज थी और इसकी कीमत लगभग 81 लाख रुपये प्रति एकड़ के आसपास थी।
सबसे बड़ा सवाल इस बात को लेकर उठ रहा है कि इतनी बड़ी संख्या में वरिष्ठ अधिकारियों ने एक साथ एक ही क्षेत्र में निवेश क्यों किया? आरोप यह भी है कि जमीन खरीदने वालों को पहले से संभावित विकास परियोजनाओं की जानकारी थी।
हाईवे मंजूरी के बाद बढ़ी जमीन की कीमत
जमीन खरीद के लगभग 16 महीने बाद क्षेत्र में 3200 करोड़ रुपये की वेस्टर्न बायपास परियोजना को मंजूरी मिल गई। इसके बाद इलाके की जमीनों की कीमतों में तेज उछाल आया। आरोप है कि परियोजना मंजूरी के करीब 10 महीने बाद खरीदी गई कृषि भूमि का लैंड यूज बदलकर उसे आवासीय श्रेणी में परिवर्तित कर दिया गया।
जानकारी के अनुसार, जिस जमीन को वर्ष 2022 में लगभग 81.75 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से खरीदा गया था, उसी क्षेत्र में बाद में जमीन की कीमत 12 से 14 करोड़ रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच गई। इस हिसाब से शुरुआती निवेश कुछ ही समय में कई गुना बढ़ गया।
“फार्महाउस” से “रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट” तक
रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि शुरुआत में इस जमीन को फार्महाउस या निजी निवेश के तौर पर खरीदा गया बताया गया था, लेकिन बाद में इसे आवासीय उपयोग के लिए परिवर्तित करने की प्रक्रिया शुरू हुई। चर्चा यह भी है कि भविष्य में यहां बड़े रिहायशी प्रोजेक्ट या प्लॉटिंग विकसित की जा सकती है।
हालांकि अब तक इस पूरे मामले में किसी बड़े अधिकारी या एजेंसी की ओर से आधिकारिक अनियमितता साबित नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह जमीन खरीद, हाईवे मंजूरी और लैंड यूज परिवर्तन की टाइमिंग सामने आई है, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने उठाई जांच की मांग
मामले के सामने आने के बाद विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि किसी अधिकारी ने अपने पद या गोपनीय जानकारी का उपयोग निजी निवेश के लिए किया है, तो यह गंभीर नैतिक और प्रशासनिक प्रश्न है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी परियोजनाओं की पूर्व जानकारी के आधार पर जमीन खरीदना “इनसाइडर एडवांटेज” की श्रेणी में आ सकता है। यदि जांच में ऐसे तथ्य सामने आते हैं, तो यह राज्य के प्रशासनिक इतिहास के बड़े भूमि विवादों में गिना जा सकता है।
सरकार और प्रशासन की नजर
अब यह मामला राज्य स्तर पर चर्चा का विषय बन चुका है। प्रशासनिक हलकों में भी इस निवेश मॉडल और उसके बाद हुई प्रक्रियाओं को लेकर बहस तेज है। उम्मीद की जा रही है कि आने वाले दिनों में सरकार या संबंधित एजेंसियां इस पूरे मामले की विस्तृत जांच कर सकती हैं।
फिलहाल यह मामला सिर्फ जमीन खरीद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सरकारी परियोजनाओं की गोपनीय जानकारी का फायदा उठाकर बड़े पैमाने पर निजी निवेश किया गया?


