बस्तर में आदिवासी महिलाओं और बच्चों के उत्थान को समर्पित श्रीमती सुनीता गोडबोले को पद्मश्री
चार दशक से अधिक समय से आदिवासी शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य जागरूकता के क्षेत्र में कर रही हैं उल्लेखनीय कार्य

रायपुर: बस्तर के सुदूर वनांचलों में आदिवासी महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण के लिए समर्पित जीवन बिताने वाली समाजसेवी Sunita Godbole को पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किए जाने पर छत्तीसगढ़ में हर्ष और गौरव का वातावरण है। पिछले चार दशकों से अधिक समय से आदिवासी समुदायों के बीच रहकर कार्य कर रहीं श्रीमती गोडबोले ने बस्तर जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता को नई दिशा दी है।
25 अप्रैल 1959 को पुणे में जन्मी श्रीमती गोडबोले ने समाज सेवा के प्रति अपने समर्पण के चलते मास्टर ऑफ सोशल वर्क (एमएसडब्ल्यू) की शिक्षा प्राप्त की। विद्यार्थी जीवन में उन्होंने आपातकाल विरोधी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की और डेढ़ महीने जेल में भी रहीं। शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने महाराष्ट्र के ठाणे और रायगढ़ जिलों के आदिवासी क्षेत्रों में विशेष रूप से बालिकाओं की शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के लिए कार्य प्रारंभ किया।
वर्ष 1990 में विवाह के बाद उन्होंने अपने पति Dr. Ramchandra Godbole के साथ बस्तर जाकर आदिवासी समुदायों की सेवा का संकल्प लिया। उस समय बस्तर अत्यंत पिछड़ा और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित क्षेत्र था। दंतेवाड़ा जिले के बारसूर क्षेत्र में अबूझमाड़ जंगल के समीप संचालित चिकित्सा सेवाओं और स्वास्थ्य शिविरों में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई। स्थानीय आदिवासी भाषाएं गोंडी और हल्बी सीखकर उन्होंने समुदाय के साथ गहरा विश्वास कायम किया, जिससे विशेष रूप से आदिवासी महिलाओं की स्वास्थ्य कार्यक्रमों में भागीदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी।
श्रीमती गोडबोले ने आदिवासी बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए वर्षों तक निरंतर कार्य किया। उन्होंने छात्रावासों में रहने वाली बालिकाओं के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सहयोग सुनिश्चित किया। महिलाओं और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को पौष्टिक भोजन तैयार करने का प्रशिक्षण दिया, आत्मनिर्भरता के लिए सिलाई प्रशिक्षण संचालित किए तथा किशोरियों के लिए विशेष शिविर आयोजित किए।
बस्तर के वन क्षेत्रों में लगातार स्वास्थ्य शिविरों के दौरान बच्चों में कुपोषण और मलेरिया की गंभीर समस्या सामने आने पर उन्होंने स्कूल आधारित पोषण और स्वास्थ्य जागरूकता अभियान प्रारंभ किया। पिछले पांच वर्षों में उनके प्रयासों से 24 गांवों के 460 बच्चों को कुपोषण से बाहर निकालने में सफलता मिली है। वर्तमान में बस्तर के तीन जिलों के 37 स्कूलों के लगभग 2,000 बच्चे प्रतिवर्ष स्वास्थ्य जागरूकता और कुपोषण रोकथाम कार्यक्रमों से लाभान्वित हो रहे हैं। इन अभियानों के साथ सिकल सेल एनीमिया के प्रति जागरूकता कार्यक्रम भी संचालित किए जाते हैं।
सामाजिक कार्यों के साथ-साथ श्रीमती गोडबोले ने बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समकक्ष अधिकार प्राप्त अर्ध-न्यायिक बोर्ड की सदस्य के रूप में भी पांच वर्षों तक सेवा दी। उन्होंने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम संबंधी सरकारी समिति की अध्यक्षता की तथा पुलिस और वन विभाग की जिला स्तरीय समितियों में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
समाज सेवा के क्षेत्र में उनके योगदान को पहले भी अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वर्ष 2001 में उन्हें और उनके पति को पुणे के नाटू प्रतिष्ठान द्वारा “सेवा गौरव पुरस्कार” प्रदान किया गया था। वर्ष 2017 में उन्हें “बाया कर्वे पुरस्कार” से सम्मानित किया गया, जबकि दंतेवाड़ा जिला प्रशासन ने भी इस दंपति को प्रशंसा प्रमाण पत्र प्रदान किया है।
पद्मश्री सम्मान के लिए चयन को बस्तर सहित पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। श्रीमती सुनीता गोडबोले का जीवन सेवा, संवेदनशीलता और आदिवासी समाज के प्रति समर्पण की प्रेरणादायी मिसाल बन गया है।
