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अद्भुत: समुद्र खुद करता है इन पांच शिवलिंगों का जलाभिषेक, लोगों को देता है मंदिर तक जाने का रास्ता

रायपुर। आज सावन का चौथा सोमवार है। कोरोना महामारी के कारण मंदिरों को बंद रखा गया है लेकिन लोग अपने श्रद्धा भक्ति के अनुसार भगवान शिव की आराधना कर रहे है। शिव भक्तों के लिए सावन महीने का विशेष मन जाता है। इस सोमवार हम आपको देश के ऐसे पांच शिवलोंगों के बारे में बताएंगे जिसे स्वयं समंदर ही जलाभिषेक करते है। प्रकृति ने अपने गर्भ में इतने रहस्यों और अद्भुत चीजों को छिपाकर रखा है, जिसे देखकर श्रद्धा और भक्ति बढ़ जाती है।

गुजरात के भावनगर में कोलियाक तट से तीन किमी. अंदर अरब सागर में निष्कलंक महादेव स्थित है। यहां पर अरब सागर की लहरें रोज पांच शिवलिंगों का जलाभिषेक करती हैं। बताया जाता है शिवलिंग के पास ही एक कुंड भी है, जिसमें अक्षय तृतीया के दिन स्वं गंगाजी प्रकट होती हैं। इस दिन यहां स्नान करने का बहुत महत्व बताया जाता है।

गुजरात के भावनगर में कोलियाक तट (Koliyak Beach) से तीन किलोमीटर अंदर अरब सागर में स्तिथ है निष्कलंक महादेव। यहाँ पर अरब सागर की लहरें रोज़ शिवलिंगों का जलाभिषेक करती हैं। लोग पानी में पैदल चलकर ही इस मंदिर में दर्शन करने जाते है। इसके लिए उन्हें ज्वार (Tide) के उतरने का इंतज़ार करना पड़ता है। भारी ज्वार (Heavy Tide) के वक़्त केवल मंदिर की पताका और खम्भा ही नजर आता है। जिसे देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता की पानी की नीचे समुंद्र में महादेव का प्राचिन मंदीर स्तिथ हैं। यहाँ पर शिवजी के पांच स्वयंभू शिवलिंग हैं।

पांडवो को लिंग रूप में भगवान शिव ने दिए थे दर्शन
इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। महाभारत के युद्ध में पांडवों ने कौरवो को पराजित करने के बाद युद्ध समाप्ति के पशचात पांडव यह जानकार बड़े दूखी हूए की उन्हें अपने ही सगे-सम्बन्धियों की हत्या का पाप लगा है। इस पाप से छुटकारा पाने के लिए पांडव, भगवन श्री कृष्ण से मिले। पाप से मुक्ति के लिए श्री कृष्ण ने पांण्डवों को एक काला ध्वज ओर एक काली गाय सौपी और पांडवों को गाय का अनुसरण करने को कहा और बताया कि जब ध्वजा और गाय दोनों का रंग काले से सफ़ेद हो जाए तो समझ लेना की तुम्हे पाप से मुक्ति मिल गई है। साथ ही श्रीकृष्ण ने उनसे यह भी कहा कि जिस जगह ऐसा हो वहां पर तुम सब भगवन शिव की तपस्या भी करना।

पांचो भाई भगवान श्री कृष्ण के कथनानुसार काली ध्वजा हाथ में लिए काली गाय का अनुसरण करने लगे। इस क्रम में वो सब कई दिनों तक अलग अलग जगह गए लेकिन गाय और ध्वजा का रंग नहीं बदला। लेकिन जब वो वर्तमान गुजरात में स्तिथ कोलियाक तट पार पहुंचे तो गाय और ध्वजा का रँग सफ़ेद हो गया। इससे पांचो पांडव बहुत खुश हुए और वही पर भगवान शिव का ध्यान करते हुए तपस्या करने लगे।

भगवान भोले नाथ उनकी तपस्या से खुश हुए ओर पांचो भाइयों को लिंग रूप में अलग-अलग दर्शन दिए। वही पांचो शिवलिंग अभी भी वही स्तिथ हैं। पांचो शिवलिंग के सामने नंदी की प्रतीमा भी हैं। पाँचों शिवलिंग एक वर्गाकार चबूतरे पर बने हुए है। तथा यह कोलियाक समुद्र तट से पूर्व की औऱ 3 किलोमीटर अंदर अरब सागर में स्तिथ है। इस चबूतरे पर एक छोटा सा पानी का तालाब भी हैं जिसे पांडव तालाब कहते हैं। श्रदालु पहले उसमे अपने हाथ पाँव धोते है और फिर शिवलिंगो की पूजा अर्चना करते है।

समुद्र देता है मंदिर तक जाने का रास्ता
इस मंदिर की विशेषता यह है कि रोज दोपहर एक बजे से रात 10 बजे भक्तों को शिवलिंग का दर्शन करने के लिए समुद्र रास्ता देता है, इसके बाद आप शिवलिंग के दर्शन नहीं कर सकते। मान्यता है कि अगर किसी प्रियजन की चिता की राख शिवलिंग पर लगाकार जल में प्रवाहित कर दें तो उसको मोक्ष मिल जाता है।

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