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जानिए कौन हैं सांसद संदीप पाठक ? जिनका छत्तीसगढ़ से गहरा कनेक्शन, अब राघव चड्ढा के साथ BJP में हुए शामिल

रायपुर: आम आदमी पार्टी (AAP) की राजनीति में शुक्रवार को बड़ा भूचाल देखने को मिला, जब राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने पार्टी से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का ऐलान कर दिया। उनके साथ राज्यसभा सांसद संदीप पाठक और अशोक मित्तल भी नजर आए। राघव चड्ढा ने दावा किया कि राज्यसभा में AAP के दो-तिहाई से अधिक सांसद उनके साथ हैं और संवैधानिक प्रावधानों के तहत BJP में विलय की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा संदीप पाठक की हो रही है, जिनका छत्तीसगढ़ से गहरा जुड़ाव रहा है। वे न केवल छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं, बल्कि लंबे समय तक AAP के संगठन विस्तार में राज्य का अहम चेहरा भी रहे।

“गलत पार्टी में सही आदमी” बोले राघव चड्ढा
दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में राघव चड्ढा ने कहा कि AAP अब अपने मूल सिद्धांतों और आदर्शों से भटक चुकी है। उन्होंने खुद को “गलत पार्टी में सही आदमी” बताते हुए कहा कि पार्टी अब देशहित नहीं, बल्कि निजी हितों के लिए काम कर रही है।

राघव चड्ढा ने कहा, “मैंने पार्टी को अपने खून-पसीने और 15 साल की मेहनत से सींचा, लेकिन अब उसका चरित्र पूरी तरह बदल चुका है। इसलिए मैंने पार्टी से अलग होने का फैसला लिया है।”

उन्होंने दावा किया कि हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, विक्रमजीत साहनी, संदीप पाठक, अशोक मित्तल और अन्य सांसद भी उनके साथ हैं। यदि यह दावा सही साबित होता है तो राज्यसभा में AAP की संख्या 10 से घटकर सिर्फ 3 रह सकती है।

छत्तीसगढ़ से है संदीप पाठक का गहरा नाता
संदीप पाठक का जन्म छत्तीसगढ़ के मंगेली जिले के बटाहा गांव में किसान परिवार में हुआ था। शुरुआती शिक्षा गांव में लेने के बाद उन्होंने बिलासपुर में पढ़ाई की। बाद में उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी की और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी तथा MIT में रिसर्च एसोसिएट के रूप में काम किया। IIT दिल्ली में प्रोफेसर रहने के बाद वे राजनीति में सक्रिय हुए।

AAP के अंदर संदीप पाठक को पार्टी का बड़ा रणनीतिकार माना जाता था। पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 में पार्टी की जीत के पीछे उनकी रणनीति को अहम माना गया। इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय संगठन में बड़ी जिम्मेदारियां मिलीं और छत्तीसगढ़ में पार्टी विस्तार का जिम्मा भी सौंपा गया।

छत्तीसगढ़ में AAP को मजबूत करने की जिम्मेदारी
संदीप पाठक लंबे समय तक AAP के छत्तीसगढ़ प्रभारी रहे। उन्होंने रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, कोरबा और बस्तर सहित कई जिलों में संगठनात्मक बैठकों और सदस्यता अभियानों का नेतृत्व किया। राज्य में पार्टी को तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करने की रणनीति पर वे लगातार काम कर रहे थे।

साल 2022 में रायपुर दौरे के दौरान उन्होंने कहा था कि छत्तीसगढ़ की जनता भाजपा और कांग्रेस दोनों से विकल्प चाहती है और AAP राज्य में मजबूत विकल्प बन सकती है। उस दौरान उन्होंने कई बड़े नेताओं के पार्टी संपर्क में होने का दावा भी किया था।

अंदरूनी नाराजगी बनी वजह?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, राघव चड्ढा और संदीप पाठक दोनों ही लंबे समय से पार्टी नेतृत्व से नाराज थे।

राघव चड्ढा को हाल ही में राज्यसभा में उपनेता पद से हटाया गया था, जबकि संदीप पाठक की संगठनात्मक भूमिका भी सीमित कर दी गई थी। बताया जा रहा है कि महत्वपूर्ण रणनीतिक फैसलों से भी उन्हें दूर रखा जाने लगा था।

संसद में AAP को बड़ा झटका
AAP के पास राज्यसभा में कुल 10 सांसद थे, जिनमें 7 पंजाब और 3 दिल्ली से हैं। अब राघव चड्ढा गुट के दावे के बाद पार्टी की संसदीय ताकत आधी से भी कम होती नजर आ रही है।

सूत्रों के मुताबिक, राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल BJP मुख्यालय पहुंच चुके हैं, जहां वे औपचारिक रूप से भाजपा की सदस्यता ले सकते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ AAP के लिए संसदीय झटका नहीं, बल्कि संगठनात्मक संकट भी है। खासतौर पर छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में, जहां पार्टी अभी अपने विस्तार की कोशिश कर रही थी, संदीप पाठक के जाने का असर साफ दिखाई दे सकता है।

छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी बढ़ी चर्चा
संदीप पाठक का छत्तीसगढ़ से भावनात्मक और राजनीतिक दोनों जुड़ाव रहा है। ऐसे में उनके BJP में शामिल होने के बाद यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या आने वाले समय में वे छत्तीसगढ़ की राजनीति में कोई सक्रिय भूमिका निभाएंगे।

वहीं BJP इस घटनाक्रम को विपक्षी एकता के कमजोर होने के संकेत के तौर पर पेश कर रही है, जबकि AAP ने इसे “विश्वासघात” बताया है।

अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या राघव चड्ढा का “दो-तिहाई सांसद” वाला दावा संवैधानिक रूप से मान्य होता है या नहीं। यदि ऐसा होता है तो यह AAP के इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक टूट साबित हो सकती है।

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